आओ दीपों को लेकर हम, आगे बढ़ते जाएं।
जाति धर्म के अंधियारे से, सदा दूर हम हो जाएं।
इसकी विविधता जिसने देखा, उसमें वो खो जाये।
इतना बड़ा देश मेरा, फिर भी प्यार रह पाये।
जो हो देश के हित में, वो हम करते जाये।
आओ दीपों को लेकर हम, आगे बढ़ते जाएं।
सब कर्तव्यों से बढ़कर भी, देश की सेवा हो।
जहां रहे भी हम, वहां देश का नाम हो।
हिंदू मुस्लिम, सिख ईसाई, हिंदुस्तानी कहलायें।
आओ दीपों को लेकर हम, आगे बढ़ते जाएं।
सब धर्मों को माने हम, इसमें कोई बैर नहीं।
संभव है यह भारत में, बाकी कहीं और नहीं।
अपने देश का कर्ज हम, प्यार बांट कर भर जाएं।
आओ दीपों को लेकर हम, आगे बढ़ते जाएं।
सौरभ कुमार
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