उत्तर प्रदेश और राजस्थान के सरकारी स्कूलों में पत्रकारों और You Tubers को बिना अनुमति के अंदर आने पर प्रतिबंध लगाए गये थे। जिसकी सुनवाई आज यानी 3 सितंबर 2026 को होनी थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने PIL को सुनने से इनकार कर दिया है।
उत्तर प्रदेश में हाल में ही अयोध्या के distric basic education officer के द्वारा 19 अगस्त 2026 को एक आदेश जारी किया गया। जिसमें कहा गया कि बाहर से आने वाले लोगों को बिना किसी अनुमान के अंदर आने नही दिया जाएगा। ये आदेश तब जारी किया गया जब पत्रकार, यूट्यूबर्स, इंफ्लूएंसर और जो पब्लिक एक्टिविस्ट UP के बदहाल स्कूलों के वीडियो और रिपोर्ट को पब्लिक के सामने और सरकार तक पहुंचा रहे थे। जहां सरकार के खोखले दावों का खुलासा हो रहा था। जो कोई सरकार नहीं चाहती है कि उसकी कमियां जनता के सामने आएं इसी के साथ उत्तर प्रदेश के कई जिलों में आदेश जारी किए गए जैसे शामली,बलिया, आजमगढ़, बलरामपुर और आगरा शामिल हैं।
राजस्थान में इससे पहले 16 अगस्त 2026 को director of secondary education officer के द्वारा जारी किए गए आदेश में किसी भी बाहर के लोगों को अंदर आने पर प्रतिबंध लगाया गया है। इस दायरे के अंदर स्कूल के परिसर में आकर फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी, लाइवस्ट्रीमिंग, और इंटरव्यू करने पर प्रतिबंध लगाए हैं।
सरकार के प्रतिबंध लगाने के क्या कारण हो सकते हैं और सरकार ने ऐसा क्यों किया? कई मीडिया रिपोर्ट और वीडियो सामने आ रहे थे। जिनमें सरकार के खोखले दावों को खुलाशा हो रहा था। जिसमें स्कूलों की जर्जर बिल्डिंग्स, शुद्ध पानी कि कमी , टॉयलेट न होना , कई जगह तो शिक्षकों की कमी पाई गई। पंखा ,बिजली जैसी सामान्य सुविधाओं की कमी है। स्कूल ठीक करो आन्दोलन चलाया जा रहा था जिसमें स्कूल की बदहाली को दिखाया जा रहा था।
This case is Priya Mishra Vs Union of India and ors का है जिसमें प्रिया मिश्रा मुख्य याचिकाकर्ता हैं जिनकी तरफ से अधिवक्ता नरेंद्र मिश्रा याचिका पेश की है। जिसमें पत्रकार, सिविल एक्टिविस्ट, मीडिया के लोगों पर वीडियोग्राफी लाइवस्ट्रीमिंग, फोटोग्राफी और इंटरव्यू करने पर प्रतिबंध लगाए गये थे जिनको चुनौती दी गई थी। इस याचिका को Artical 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में पेश किया गया था। जिसमें मौलिक अधिकारों का हनन बताया गया था। दूसरे पक्ष की तरफ दलील दी गई थी जिसमें नाबालिक बच्चों की privacy, dignity and safety को भी सुरक्षित करना जरूरी है।
जस्टिस PS नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की बेंच ने इस मामले पर विस्तृत जानकारी देने के बजाय इसे सुनने से इनकार कर दिया है और इस प्रतिबंध पर कोई वैध और अवैध जानकारी नहीं दी ।
कोर्ट का आदेश था
We are not inclined to entertain the writ petition filed under Article 32 of the constitution of India.
